निजी स्कूलों की मनमानी से टूट रही मध्यम वर्ग की कमर कमीशन का खेल, महंगी किताबें और दबती प्रतिभाएं
सम्पादकीय लेख
शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की सबसे मजबूत नींव माना गया है, लेकिन आज यही शिक्षा व्यवस्था मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा आर्थिक संकट बनती जा रही है। निजी स्कूलों की मनमानी, लगातार बढ़ती फीस, और शिक्षा के नाम पर चल रहे कमीशन के खेल ने अभिभावकों को गहरी चिंता और बेबसी में डाल दिया है।
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सम्पादकीय लेख
शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की सबसे मजबूत नींव माना गया है, लेकिन आज यही शिक्षा व्यवस्था मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा आर्थिक संकट बनती जा रही है। निजी स्कूलों की मनमानी, लगातार बढ़ती फीस, और शिक्षा के नाम पर चल रहे कमीशन के खेल ने अभिभावकों को गहरी चिंता और बेबसी में डाल दिया है।
निजी स्कूलों में हर साल फीस बढ़ाना अब एक परंपरा बन चुकी है। ट्यूशन फीस के अलावा विकास शुल्क, वार्षिक शुल्क, स्मार्ट क्लास शुल्क और न जाने कितने नामों पर अतिरिक्त रकम वसूली जाती है। अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य के लिए यह सब सहने को मजबूर हैं, लेकिन उनकी आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, जिससे आर्थिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है।
समस्या यहीं खत्म नहीं होती। किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भी एक सुनियोजित व्यवस्था काम कर रही है। जहां एक ओर सरकार द्वारा निर्धारित एनसीईआरटी की किताबें सस्ती और सुलभ हैं, वहीं कई निजी स्कूल जानबूझकर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें लागू करते हैं। इन किताबों को केवल तय दुकानों से ही खरीदने का दबाव बनाया जाता है, जहां कीमतें बाजार से कहीं अधिक होती हैं। यह पूरा सिस्टम कमीशन पर आधारित होता है, जिसका सीधा बोझ अभिभावकों की जेब पर पड़ता है।
इस मनमानी का सबसे खतरनाक असर बच्चों की प्रतिभा पर पड़ रहा है। आर्थिक तंगी के कारण कई होनहार छात्र अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। कुछ अभिभावक मजबूरी में बच्चों को सस्ते या कम संसाधनों वाले स्कूलों में भेजने को मजबूर होते हैं, जिससे उनके भविष्य पर असर पड़ता है। शिक्षा, जो समान अवसर देने का माध्यम होनी चाहिए, अब असमानता को बढ़ाने का कारण बनती जा रही है।
सरकार और प्रशासन की भूमिका इस पूरे मुद्दे में बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन जमीनी स्तर पर सख्ती की कमी साफ नजर आती है। नियम तो बनाए जाते हैं, पर उनका पालन सुनिश्चित नहीं किया जाता। जरूरत है कि फीस नियंत्रण के लिए सख्त कानून लागू हों, निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगे और किताबों के चयन में पारदर्शिता लाई जाए। एनसीईआरटी जैसी सस्ती और मानक किताबों को प्राथमिकता देना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
साथ ही, अभिभावकों को भी जागरूक और संगठित होने की आवश्यकता है। जब तक वे अपनी आवाज एकजुट होकर नहीं उठाएंगे, तब तक इस व्यवस्था में बदलाव संभव नहीं है। शिक्षा कोई व्यापार नहीं, बल्कि समाज के निर्माण का माध्यम है, और इसे उसी भावना से संचालित किया जाना चाहिए।
अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल संपन्न वर्ग तक सीमित होकर रह जाएगी। मध्यम वर्ग के सपने, जो अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए देखे जाते हैं, धीरे-धीरे टूटते नजर आएंगे। यह केवल एक वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल है।