"गुलामी की पुरानी सोच: जब 'विश्व गुरु' बनना 'विश्व चेला' बनने में बदल गया"
"हमने सदियों तक 'विश्व गुरु' बनने का सपना देखा था, लेकिन आज का भारत एक बार फिर उसी पुरानी मानसिकता में फंसता दिख रहा है। सोच वही है, चरित्र वही है—जहाँ गुलामी का इतिहास अभी भी जिंदा है, और चाटुकारिता की राजनीति ने एक बार फिर से जगह बना ली है। जब हम सावरकर जैसे प्रतीकों के बारे में सोचते हैं, तो हमें याद रखना होगा कि उनके विचार आज भी जीवित हैं, उनके वारिस नए चेहरे के रूप में सामने आ रहे हैं। यदि हमें सच में एक स्वतंत्र, प्रगतिशील राष्ट्र बनना है, तो हमें इस बंद मानसिकता को तोड़ना होगा और एक नई दिशा में कदम बढ़ाना होगा।"
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