संपादकीय

कतारों में खड़ा भारत – नोटबंदी से कोरोना तक आम नागरिक की अनकही कहानी

भारत की तस्वीर सिर्फ उसकी तरक्की, विकास और उपलब्धियों से नहीं बनती, बल्कि उन संघर्षों से भी बनती है जिन्हें आम नागरिक रोज़ जीता है। बीते कुछ वर्षों में देश ने ऐसे दो बड़े दौर देखे, जब सड़कों से लेकर अस्पतालों तक सिर्फ एक ही चीज़ नजर आई—लंबी कतारें। ये कतारें सिर्फ इंतज़ार की नहीं थीं, बल्कि बेबसी, उम्मीद और जंग की प्रतीक बन गईं।नोटबंदी हो, कोरोना हो, महंगाई हो या प्राकृतिक आपदाएं—इन सभी ने यह दिखा दिया कि भारत की असली ताकत उसकी जनता है। कतारें भले ही खत्म न हों, लेकिन उन कतारों में खड़ा हर इंसान उम्मीद और हिम्मत का प्रतीक है। यही वह जज़्बा है जो हर मुश्किल के बाद भारत को फिर से खड़ा कर देता है।

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भारत की असली तस्वीर सिर्फ उसकी तरक्की से नहीं, बल्कि उन मुश्किल हालात से भी बनती है जिनमें आम नागरिक रोज़ जूझता है। बीते कुछ वर्षों में देश ने कई ऐसे दौर देखे, जब सड़कों, बैंकों, अस्पतालों और यहां तक कि राशन की दुकानों तक एक ही दृश्य नजर आया—लंबी कतारें। ये कतारें सिर्फ इंतज़ार की नहीं, बल्कि संघर्ष, बेबसी और उम्मीद की कहानी कहती हैं। साल 2016 में 2016 Indian demonetization ने पूरे देश को झकझोर दिया। अचानक लिए गए इस फैसले के बाद आम आदमी अपने ही पैसे के लिए लाइन में खड़ा हो गया। बैंक और एटीएम के बाहर घंटों खड़े लोग, काम-धंधा छोड़कर अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। मजदूरों की दिहाड़ी छिन गई, छोटे कारोबार ठप हो गए—और हर चेहरे पर एक ही सवाल था, “अब क्या?” इसके बाद दुनिया ने देखा COVID-19 का कहर। खासकर दूसरी लहर ने भारत में हालात को बेहद गंभीर बना दिया। अस्पतालों के बाहर बेड के लिए लाइन, ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए संघर्ष, और दवाइयों की कमी—यह सब एक ऐसी त्रासदी थी जिसे भुलाना मुश्किल है। लोग अपने अपनों की जान बचाने के लिए सड़कों पर भटकते नजर आए। लेकिन कठिनाइयों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। लॉकडाउन का असर: कोरोना के दौरान लगे लॉकडाउन ने करोड़ों लोगों का रोजगार छीन लिया। दिहाड़ी मजदूर और छोटे व्यापारी सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। शहरों से गांवों की ओर पैदल लौटते मजदूरों की तस्वीरें देश की संवेदनशीलता को झकझोर गईं। महंगाई और बेरोजगारी: बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी। पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर और रोजमर्रा की चीजों के दाम लगातार बढ़ते रहे, जबकि रोजगार के अवसर उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाए। इससे मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग दोनों पर दबाव बढ़ा। प्राकृतिक आपदाएं: भारत ने कई बार बाढ़, चक्रवात और गर्मी की लहरों जैसी आपदाओं का सामना किया। गांवों में खेत बर्बाद हुए, घर उजड़ गए और लोगों को राहत शिविरों में जीवन बिताना पड़ा। किसान आंदोलन: 2020–2021 Indian farmers' protest के दौरान हजारों किसान महीनों तक सड़कों पर बैठे रहे। यह भी एक तरह की लंबी “कतार” ही थी—अपने अधिकारों और भविष्य के लिए संघर्ष की कतार। राशन और योजनाओं की लाइनें: कई बार गरीब तबके को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए भी लंबी कतारों में लगना पड़ता है—चाहे वह राशन की दुकान हो, गैस कनेक्शन हो या किसी योजना का फॉर्म। इन सभी परिस्थितियों में एक बात साफ नजर आती है—हर बड़ा फैसला या संकट सबसे ज्यादा आम नागरिक को ही प्रभावित करता है। वही हर बार सबसे लंबी लाइन में खड़ा होता है, सबसे ज्यादा इंतजार करता है, और सबसे ज्यादा संघर्ष करता है। लेकिन इन मुश्किलों के बीच एक और सच्चाई भी सामने आती है—भारत की जनता की अद्भुत सहनशीलता और एकजुटता। जब-जब हालात खराब हुए, लोगों ने एक-दूसरे का हाथ थामा। किसी ने भूखों को खाना खिलाया, किसी ने मुफ्त इलाज कराया, तो किसी ने सिर्फ हौसला दिया।
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